शाहरुख खान एक ऐसा नाम जिसने अपने किये वादे को बखूबी निभाया, बॉलीवुड पर राज करने के सपने को साकार कर दिखाया। आज वो केवल बॉलीवुड ही नही बल्कि दुनिया के चार सबसे अमीर एक्टरों में से एक हैं। आज के इस पोस्ट में बात करेंगे- Shahrukh Khan Struggle के बारे में और जानेगे कि कैसे उन्होंने अपने दम पर बॉलीवुड पर राज किया।
जब आज आप मुंबई के बांद्रा इलाके में ‘मन्नत’ नाम के उस मशहूर बंगले के सामने जाएंगे, तो ऐसा लगेगा मानो वो कोई आम घर नहीं बल्कि किसी तीर्थ स्थल की तरह हो, जहाँ लोग सिर्फ एक झलक पाने के लिए घंटों इंतजार करते हैं। लेकिन जरा पीछे मुड़कर उस दौर को देखिए—90 के दशक में जब एक दुबला-पतला लड़का दिल्ली की गलियों से निकलकर मायानगरी मुंबई आया था, तो फिल्म इंडस्ट्री के कुछ तथाकथित जानकारों ने उसके बारे में क्या-क्या नहीं कहा था!
उस समय के कुछ लोगों का मज़ाक उड़ाते हुए यहाँ तक कहना था:
“अरे इस शख्स को तो देखिए, इसका चेहरा देखिए, इसकी नाक का नक्शा अजीब है, बाल बिखरे हुए हैं और इतनी रफ़्तार से बोलता है! इसे एक्टिंग में हाथ आजमाने के बजाय किसी छोटी सी दुकान पर सेल्समैन की नौकरी करनी चाहिए।”
मगर कहते हैं ना कि जिन पर दुनिया उंगलियां उठाती है, वही लोग आगे चलकर इतिहास रचते हैं। आज हम बात कर रहे हैं ग्लोबल आइकॉन और बॉलीवुड के ‘किंग’ शाहरुख खान की—जो आज दुनिया के सबसे अमीर कलाकारों में गिने जाते हैं और जिनकी कुल संपत्ति हजारों करोड़ में है। एक वक्त था जब उन्हें अपनी डेब्यू फिल्म ‘दीवाना’ के लिए महज ₹150 मिले थे, और आज वह सफलता के उस मुकाम पर हैं जहाँ से हर कोई प्रेरणा लेता है। आइए जानते हैं उनकी इस लंबी और रोमांचक संघर्ष यात्रा के बारे में!
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दिल्ली का अल्हड़पन और मुंबई की कठोर सच्चाई
इस सफर की शुरुआत होती है भारत की राजधानी दिल्ली से। शाहरुख खान अपने दिल्ली वाले अंदाज़ और पूरे टशन में रहते थे। उस वक्त दूरदर्शन पर आने वाले शो ‘फौजी’ और ‘सर्कस’ से उन्हें थोड़ी-बहुत पहचान मिल चुकी थी, जिसके चलते उन्हें अपने स्टार होने का एक अलग ही गुरूर हो गया था।
इसी आत्मविश्वास के साथ वह मुंबई का सफर तय करने के लिए ट्रेन में सवार हुए। दिल्ली के युवाओं की तरह उन्हें भी अपनी सीट पर धौंस जमाने की आदत थी। रास्ते में एक महिला यात्री आईं और उन्होंने शाहरुख से कहा, “भैया, थोड़ा साइड दीजिए ताकि मैं बैठ सकूं।”
इस पर शाहरुख ने अपने पूरे फिल्मी मिजाज और तेवर में जवाब दिया, “मैडम, शायद आप जानती नहीं हैं कि मैं कौन हूँ? मैं टेलीविज़न का जाना-माना स्टार हूँ!”
बस फिर क्या था, उस पल उनका सारा का सारा गुरूर पलभर में उतर गया और उन्हें अच्छी तरह समझ आ गया कि यह मायानगरी मुंबई है—यहाँ दिल्ली वाला रौब किसी काम नहीं आने वाला!
जब रूप-रंग को लेकर इंडस्ट्री ने दिखा दिया था रास्ता
मुंबई की सरजमीं पर कदम रखने के बाद शाहरुख ने अनगिनत निर्देशकों और निर्माताओं के दफ्तरों के चक्कर काटने शुरू किए। उस दौर में फिल्मों में हीरो की एक खास परिभाषा हुआ करती थी—करीब 6 फीट लंबी कद-काठी, गोरा रंग और सूपर-स्टाइलिश बाल (जैसे उस समय के दिग्गज कलाकार जैकी श्रॉफ या आमिर खान हुआ करते थे)।
लेकिन हमारे शाहरुख खान की बात अलग थी—उनकी लंबाई लगभग 5 फुट 8 इंच थी, सांवला रंग था और बाल ऐसे जैसे तेज हवा या बिजली के झटके से उलझ गए हों!
बात यहीं खत्म नहीं हुई। एक निर्देशक ने तो उन्हें साफ शब्दों में यहाँ तक कह दिया था:
“तुम्हारी अभिनय क्षमता अच्छी है, लेकिन तुम मुख्य अभिनेता यानी हीरो नहीं बन सकते। हाँ, तुम साइड रोल या हीरो के दोस्त का किरदार निभा सकते हो, इसलिए परदे पर लीड रोल पाने का ख्याल दिल से निकाल दो।”
लेकिन वो शाहरुख खान ही क्या जो आसानी से हार मान ले! उन्होंने मन ही मन ठान लिया कि अगर मेरा चेहरा पारंपरिक रूप से रोमांटिक नहीं है, तो क्या हुआ? मैं अपनी बाहें इस शिद्दत से फैलाऊंगा कि पूरी दुनिया मेरे इस अंदाज पर फिदा हो जाएगी। और सच मानिए, आगे चलकर यही उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी।
‘डर’ फिल्म का साहसी फैसला और विलेन का महानायक बनना
साल 1993 की बात है, जब मशहूर फिल्ममेकर यश चोपड़ा अपनी एक फिल्म ‘डर’ पर काम कर रहे थे। इस प्रोजेक्ट के लिए एक ऐसे कलाकार की जरूरत थी जो नेगेटिव शेड वाले यानी एक जुनूनी और जुनूनी आशिक के किरदार को परदे पर उतार सके। उस समय के कई बड़े कलाकारों ने इस रोल को करने से साफ इनकार कर दिया था, क्योंकि तब इंडस्ट्री में यह धारणा थी कि मुख्य अभिनेता के रूप में पहचान बनाने के बाद नकारात्मक भूमिका निभाने से करियर पर दाग लग सकता है।
परंतु शाहरुख खान की मिट्टी ही अलग थी। उन्होंने बिना किसी झिझक के कहा—”यह किरदार मुझे दीजिए। अगर मुख्य दरवाजे से एंट्री का मौका नहीं मिलेगा, तो मैं खिड़की से अंदर आऊंगा!”
जब फिल्म सिनेमाघरों में उतरी, तो मुख्य भूमिका में सनी देओल थे, लेकिन जैसे ही परदे पर शाहरुख की धमाकेदार एंट्री हुई और उनका वह आइकॉनिक डायलॉग गूंजा, तो पूरी महफिल ही पलट गई।
सिनेमाहॉलों में दर्शक फिल्म के हीरो के बजाय उस नेगेटिव किरदार के लिए सीटियां बजा रहे थे। भारतीय सिनेमा के इतिहास में शायद यह पहला मौका था जब एक खलनायक ने दर्शकों के दिलों पर इस तरह राज किया हो।
“मन्नत का बिजली का बिल बहुत आता है!” – ज़मीन से जुड़े रहने की दास्तान
बहुत कम लोग इस बात से वाकिफ हैं कि शाहरुख खान जितने बेहतरीन कलाकार हैं, उतने ही शानदार और दूरदर्शी बिजनेसमैन भी हैं। जब उन्होंने मुंबई के समंदर किनारे अपना सपनों का आशियाना ‘मन्नत’ खरीदा था, तब कई लोग हैरान थे कि इतने बड़े स्टार होने के बावजूद वह पार्टियों में डांस करने, विज्ञापन शूट करने और शोज होस्ट करने क्यों जाते हैं।
एक बार एक इंटरव्यू के दौरान किसी पत्रकार ने उनसे यही सवाल पूछ लिया कि आपके पास शोहरत और दौलत की कोई कमी नहीं है, फिर भी आप प्राइवेट इवेंट्स या शादियों में डांस क्यों करते हैं?
इस पर शाहरुख ने अपनी खास मुस्कान के साथ बेहद सहजता से जवाब दिया था:
“देखिए भाई, मन्नत का बिजली का खर्च ही इतना ज्यादा है कि अगर मैं लगातार मेहनत और काम नहीं करूंगा, तो एक दिन ऐसा आएगा कि इस घर को भी नीलाम करना पड़ जाएगा!”
यही उनकी सबसे बड़ी खूबी है कि वह बुलंदी पर पहुंचकर भी हमेशा अपनी जड़ों से जुड़े रहे। उन्हें कभी इस बात का अहंकार नहीं हुआ कि लोग उनके काम के बारे में क्या कहेंगे। जहाँ से भी उन्हें अपनी मेहनत का सही मेहनताना मिला, उन्होंने पूरी ईमानदारी से काम किया और आज वे दुनिया के सबसे सफल और अमीर कलाकारों में शुमार हैं।
समंदर किनारे बैठकर देखा गया वो बड़ा सपना
आखिर शाहरुख खान की शख्सियत में ऐसी क्या जादूई बात थी जो उन्हें दूसरों से अलग बनाती है?
इसका सबसे सीधा जवाब है—उनका अटूट आत्मविश्वास और जिंदगी में कुछ कर दिखाने की कभी न खत्म होने वाली भूख। जब वह पहली बार इस अनजान शहर में आए थे, तब मरीन ड्राइव के समंदर किनारे खड़े होकर उन्होंने एक बड़ी बात कही थी:
“एक दिन ऐसा आएगा जब इस पूरे शहर पर मेरा कब्जा होगा!”
उस वक्त शायद उनकी इस बात को सुनकर किसी ने इसे उनका पागलपन समझा होगा, लेकिन शाहरुख ने अपने उस वादे को पूरा करने के लिए अपनी रातों की नींद और आराम सब कुछ दांव पर लगा दिया। वो आज भी गर्व से इस बात को दोहराते हैं कि वह दिनभर में केवल चार घंटे ही सोते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि ज्यादा सोना यानी अपने कीमती वक्त को गंवाना है।
मेरी ख़ुद की समझ
यह पूरी कहानी हमें यह सिखाती है कि अगर आपके भीतर अपने लक्ष्य को पाने का जुनून और पागलपन है, तो कोई भी रुकावट आपको रोक नहीं सकती। जब भी कोई इंसान किसी चीज़ को पाने की ठान लेता हैं और पूरी सिद्धत से उसे पाने के लिए मेहनत करता हैं तो उसे ज़रूर हासिल कर सकता हैं।
कहा जाता हैं कि इंसान जहाँ तक सोच सकता हैं वहां पहुँच भी सकता हैं। इस बात को अच्छी तरह से साबित किया हैं बॉलीवुड के किंग शाहरुख खान ने।
आपको शाहरुख खान की यह संघर्ष भरी दास्तान कैसी लगी और इससे आपको क्या सीख मिली? हमें नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं!
