सनी देओल और प्रीति ज़िंटा स्टारर फिल्म बटवारा 1947 रिलीज़ हुई 14 अगस्त 2026 कोऔर इस फिल्म से दर्शकों को काफ़ी उम्मीद थी क्योंकि वो एक बार फिर से अपने चहेते स्टार सनी देओल को पुराने अंदाज़ में देखना चाहते थे जैसा ग़दर एक प्रेम कथा , बॉर्डर जैसी फिल्मों में देखा था लेकिन हुआ इसके बिलकुल विपरीत | लोगों ने जो भी उम्मीद लगाई थी वैसा कुछ भी नहीं मिला इस फिल्म में और उनको निराशा हाथ लगी और फिल्म भी फ्लॉप के कगार पर पहुँच गई | तो आज के इस लेख में जानेगे Why Why Did Batwara 1947 Flop साथ ही जानेगे आखिर वो कौन कौन से कारण थे जिसके कारण फ़िल्म हुई फ़्लॉप ?
सनी देओल, राजकुमार संतोषी और आमिर खान जैसे इतने बड़े प्रोडक्शन की फिल्म होने के बाद भी भी फ़िल्म सबको निराश कर दिया | ये फ़िल्म भारत और पाकिस्तान के बटवारे पर आधारित फ़िल्म होने के बाद भी कुछ ख़ास नहीं कर पाई, और सबसे ख़ास बात कि वही सनी देओल और राजकुमार संतोषी की जोड़ी लगभग 30 सलों बाद लौटी थी |
फ़िल्म के रिलीज़ होने के बाद फ़िल्म उम्मीद के मुताबिक़ प्रदर्शन नहीं कर पाई और फिर सोशल मीडिया पर फिल्म की असफ़लता को लेकर बातें शुरू हो गई |
शबाना आज़मी ने बताये ख़राब प्रदर्शन के कारण
इस फिल्म में हिन्दू मां का किरदार निभाने वाली शबाना आज़मी ने फिल्म को लेकर एक बहुत बड़ा खुलासा कर दिया जिसको लेकर बहस और तेज़ हो गई हैं – उन्होंने कहा दर्शक सनी देओल को मुस्लिम किरदार में स्वीकार नहीं कर पाए जिसके कारण फिल्म ने बॉक्सऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई | उन्होंने साथ ही कहा कि जितने लोगों से मिली वो फ़िल्म की तारीफ़ किया लेक़िन मुस्लिम किरदार के कारण लोगों ने फिल्म को नकार दिया |
लेकिन क्या वास्तव में सनी देओल का मुस्लिम किरदार ही फिल्म के फ्लॉप होने की सबसे बड़ी वजह था? या इसके पीछे कहानी, स्क्रीनप्ले, रिलीज क्लैश और दर्शकों की बदलती पसंद जैसे कई दूसरे कारण भी थे?
आइए पूरे मामले को समझते हैं।
‘बंटवारा 1947’ में सनी देओल का किरदार
इस फिल्म में सनी देओल एक भारतीय मुस्लिम सिकंदर मिर्ज़ा का किरदार निभाया हैं जो बाद में बटवारे के बाद पाकिस्तान चला जाता हैं और वहां वो शुरआत में हिन्दुओं को काफ़िर नज़र से देखते हैं और वहां एक हिन्दू महिला जिनका घर उन्हें सर्कार के द्वारा अलॉट किया जाता हैं उनको घर निकालने की पूरी कोशिश करते हैं और इसमें उनकी पत्नी और बीटा भी शामिल होता हैं |
वही फ़िल्म कई सनी देओल हिन्दुओं के अगेन्स्ट कई सारे डायलॉग सुनने को मिलता हैं जो कही से सनी देओल का औरा बना हैं भारतीय सिनेमा में वो मैच नहीं करता हैं ये सबसे बड़ा कारण था फिल्म फ्लॉप की कगार की तरफ ले जाने का | ये भूमिका सनी देओल के आम पर्दे वाले व्यक्तित्व से काफी अलग थी।
सनी देओल की पहचान एक ऐसे एक्टर के तौर पर होती हैं जो देशभक्ति, एक्शन , और मज़बूत डायलॉग के साथ दमदार एक्टिंग करते हैं लेकिन इस फिल्म में वैसा कुछ भी नहीं था जो सनी के करैक्टर से मेल हो, और ये बहुत बड़ी वजह बनी फ़िल्म के ख़राब प्रदर्शन की |
लेकिन ‘बंटवारा 1947’ में कहानी का केंद्र एक मुस्लिम परिवार और विभाजन के दौरान इंसानियत को बचाने की कोशिश करने वाला किरदार है। यही विरोधाभास फिल्म की कास्टिंग को शुरुआत से ही चर्चा में लेकर आया था। हाँ ये बात बिल्कुल सही हैं की ख़ासकर देशभक्ति फिल्मों में सनी देओल का मुस्लिम किरदार दर्शकों को बिलकुल पसंद नहीं आया |
इस बात की पुष्टि खुद राजकुमार संतोषी ने भी किया हैं उन्होंने कहा कि फिल्म की कहानी लगभग 2010 से उनके पास थी और मुस्लिम नायक तथा पाकिस्तान की पृष्ठभूमि वाली कहानी को लेकर इसे बनाने में काफी समय लगा।
राजकुमार संतोषी ने शबाना आजमी की बातों को नकार दिया
शबाना आजमी की फिल्म को लेकर की गई टिप्पणी पर फिल्म के निर्देशक राजकुमार संतोषी की प्रतिक्रिया भी सामने आई। संतोषी ने इस विचार से असहमति जताई कि दर्शक सनी देओल को मुस्लिम नायक के रूप में स्वीकार नहीं कर पाए, इसलिए फिल्म असफल हुई।
राजकुमार संतोषी का कहना है कि एक अभिनेता को अलग-अलग तरह के किरदार निभाने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए यह भी सवाल उठाया कि अगर किसी अभिनेता ने पहले एक खास तरह की भूमिका निभाई है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह किसी दूसरे समुदाय या अलग व्यक्तित्व का किरदार नहीं निभा सकता। इससे साफ है कि फिल्म की असफलता को केवल सनी देओल के मुस्लिम किरदार से जोड़ना अभी एक निष्कर्ष नहीं, बल्कि एक बहस का विषय है।
लेक़िन यहाँ मैं एक बात कहना चाहूंगा कि ये बात सही हैं की एक एक्टर को अलग अलग किदार निभाना चाहिए लेक़िन एक ऐसा एक्टर जिसका एक अलग इमेज बना हो, ख़ासकर देशभक्ति फ़िल्म को लेकर उसको जान बूझकर मुस्लिम किरदार देना कही से उचित नहीं हैं और कोई कुछ भी कहे एक बड़ा दर्शक वर्ग यही मानता हैं कि सनी देओल का मुस्लिम किरदार होना ही फ़िल्म का फ़्लॉप होने का कारण बनी हैं |
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क्या सनी देओल की इमेज के ख़िलाफ़ थी फ़िल्म ?
अब ये सवाल सबसे महत्वपूर्ण है। सनी देओल की स्क्रीन इमेज 10 को से काफी मजबूत रही है उन्होंने घायल, घातक, बॉर्डर और गदर जैसी फ़िल्में की है जो सुपर डुपर हिट फिल्म रही है और उनकी इमेज एक अलग टाइप की देशभक्त और एक्शन हीरो के रूप में स्थापित रही हैं।
ख़ासकर ग़दर एक प्रेम कथा के तारा सिंह का किरदार आज भी लोगों के ज़ेहन में बसा हैं जो अकेले पाकिस्तान को हिला कर रख देते हैं ऐसे में जब वही अभिनेता ‘बंटवारा 1947’ में एक मुस्लिम परिवार के मुखिया के रूप में दिखाई देते हैं, तो कुछ दर्शकों को यह बदलाव असामान्य लगना लाज़मी हैं।
फ़िल्म की पटकथा भी कारण रही
लेकिन इसके अलावा भी फ़िल्म की असफ़लता के कुछ और कारण हैं फ़िल्म फर्स्ट हाफ बहुत हो स्लो प्रतीत होता हैं सनी का वो टेम्परामेंट कही देखने को नही मिलता हैं। बस एक शुरू के सीन को छोड़ दे तो जहां वो ट्रेन पकड़ने की कोशिश करते हैं।
किसी भी फ़िल्म में अभिनेता की स्थापित छवि कभी-कभी फिल्म के लिए फायदेमंद तो कभी चुनौती भी बन जाती हैं। यहां संभव है कि कुछ दर्शकों की उम्मीदें सनी देओल की पुरानी फिल्मों से जुड़ी रही हों, जबकि फिल्म का टोन और विषय उससे अलग था।
फिल्म की कहानी को लेकर भी उठे सवाल
किसी भी फिल्म में केवल स्टार कास्ट होना ही फिल्म की सफलता की गारंटी नहीं होती है बटवारा 1947 जैसी पीरियड फिल्म के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि वह इतिहास भावनाओं और मनोरंजन के बीच संतुलन बनाने में पूरी तरह सक्षम नही हो पाई।
बटवारा 1947 को लेकर शुरुआत से ही प्रतिक्रिया मिलीजुली थी कुछ दर्शको को इसके संदेश और भावनात्मक पक्ष अच्छे लगे वही कुछ लोगों ने स्क्रीन प्ले और कहानी पर भी सवाल उठाये।
ऐसे में यह कहना ज्यादा उचित होगा कि फिल्म को लेकर दर्शकों की प्रतिक्रिया एक कारण से प्रभावित नहीं हुई होगी।
रिलीज डेट और बॉक्स ऑफिस मुकाबला भी बना चुनौती
‘बंटवारा 1947’ को अकेले बॉक्स ऑफिस पर मुकाबला नहीं करना पड़ा।
फिल्म के साथ ‘आवारापन 2’ भी रिलीज हुई। दोनों फिल्मों के बीच सीधे तौर पर दर्शकों और स्क्रीन का मुकाबला हुआ।
बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट्स के मुताबिक ‘बंटवारा 1947’ को शुरुआत से ही ‘आवारापन 2’ की मजबूत कमाई से चुनौती मिली। बाद में ‘टॉक्सिक’ जैसी बड़ी फिल्म के आने से भी स्क्रीन और दर्शकों के लिए प्रतिस्पर्धा और बढ़ गई।
इसलिए फिल्म की कमजोर कमाई का विश्लेषण करते समय रिलीज के समय मौजूद प्रतियोगिता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

दिलचस्प बात: सनी देओल पहले भी मुस्लिम किरदार निभा चुके हैं
यह भी दिलचस्प है कि सनी देओल इससे पहले भी मुस्लिम किरदार निभा चुके हैं।
2010 में रिलीज हुई फिल्म ‘खुदा कसम’ में उन्होंने मुस्लिम किरदार निभाया था। हालांकि वह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं रही थी।
इस पुराने उदाहरण को भी मीडिया में ‘बंटवारा 1947’ के संदर्भ में याद किया जा रहा है। लेकिन दोनों फिल्मों की असफलता के कारणों को एक जैसा मानना उचित नहीं होगा, क्योंकि दोनों फिल्मों का समय, विषय, निर्माण और रिलीज परिस्थितियां अलग थीं।
फिर ‘बंटवारा 1947’ क्यों नहीं चली?
फिल्म की असफलता को समझने के लिए कई पहलुओं को एक साथ देखना जरूरी है।
1. सनी देओल की स्थापित इमेज
दर्शक सनी देओल को लंबे समय से एक्शन और देशभक्ति वाले किरदारों में देखते आए हैं। इसलिए उनके मुस्लिम किरदार को लेकर कुछ दर्शकों के मन में शुरुआती झिझक संभव है।
2. गंभीर और संवेदनशील विषय
भारत का विभाजन एक भावनात्मक और ऐतिहासिक विषय है। ऐसी फिल्मों को व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाने के लिए कहानी और मनोरंजन का संतुलन बेहद महत्वपूर्ण होता है।
3. स्क्रीनप्ले और दर्शकों की प्रतिक्रिया
फिल्म को मिली मिश्रित प्रतिक्रियाओं से संकेत मिलता है कि हर दर्शक फिल्म की कहानी और प्रस्तुति से समान रूप से प्रभावित नहीं हुआ।
4. बॉक्स ऑफिस क्लैश
‘आवारापन 2’ के साथ रिलीज और बाद में दूसरी बड़ी फिल्मों की मौजूदगी ने फिल्म के स्क्रीन शेयर और दर्शकों के विकल्पों पर असर डाला।
5. उम्मीदें बहुत ज्यादा थीं
सनी देओल और राजकुमार संतोषी की पुरानी सफल जोड़ी, ‘गदर 2’ के बाद सनी की लोकप्रियता, प्रीति जिंटा की वापसी और आमिर खान प्रोडक्शंस का समर्थन—इन सबने फिल्म के प्रति उम्मीदें काफी बढ़ा दी थीं।
जब किसी फिल्म से उम्मीद बहुत ज्यादा होती है और बॉक्स ऑफिस पर शुरुआती प्रदर्शन कमजोर रहता है, तो उसकी असफलता ज्यादा बड़ी दिखाई देती है।
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क्या फिल्म का संदेश दर्शकों को पसंद आया?
यहां एक दिलचस्प विरोधाभास दिखाई देता है। शबाना आजमी ने खुद कहा कि जिन लोगों से वह मिल रही थीं, उनमें कई लोगों ने फिल्म और उसके संदेश की तारीफ की। लेकिन वही सकारात्मक प्रतिक्रिया टिकट खिड़की पर बड़े दर्शक वर्ग में बदलती हुई दिखाई नहीं दी।
हालांकि ये उनका अपना मानना हो सकता हैं कि फ़िल्म की लोगों ने तारीफ़ की लेक़िन कुछ लोगों के कहने से कोई बात पूरी तरह सही साबित नही हो जाती। ज़्यादातर लोगों ने फ़िल्म को पसंद नही किया।
बॉलीवुड हेल्प सेंटर की प्रतिक्रिया
जब मैंने ये फ़िल्म देखी तो शुरू से ही मुझे फ़िल्म में वो टेम्परामेंट नज़र नही आया जो सनी देओल की फ़िल्म में ख़ासकर देशभक्ति फ़िल्म में देखने को मिलता हैं। वही मेरा अपना मानना हैं कि ये एक साज़िश थी सनी देओल के किरदार को गिराने की।
इसलिए फ़िल्म में उनको मुस्लिम किरदार दिया गया, और ये बताने की कोशिश की गई कि मुस्लिम बहुत अच्छे होते हैं और हिन्दू ख़राब होते हैं। इस सब के पीछे आमिर खान की सोची समझी राजनीति झलकती हैं।
जानबूझकर ऐसा स्क्रिप्ट लिखा गया और सनी को कास्ट किया गया, आमिर खान ने जब PK बनाई थी उस समय भी विरोध हुआ था क्योंकि उसमें भी हिन्दू देवी देवता को टारगेट किया गया था।
लेक़िन यहाँ सनी देओल को भी सोचना चाहिए था आने इमेज के बारे में और उनको ये फ़िल्म नही करना चाहिए था, लेक़िन उनको 60 करोड़ दिखा। आज 70 साल के उम्र में सनी को जवानी से ज़्यादा फिल्में मिल रही हैं यही बातें इंडस्ट्री के कुछ लोगों को हज़म नही हो पाया, साथ आजतक बॉलीवुड में कोई ऐसा किरदार भी नही जो सन्नी देओल ने निभाया हैं। कुल मिलाकर ये सोची समझी चाल थी हिंदुओं को नीचा दिखाने का और सनी के किरदार और छवि को कमज़ोर करने की।
यही कारण था कि फ़िल्म को लेकर कई हिन्दू संगठनों ने आमिर खान का पुतला जलाया और विरोध प्रदर्शन किए। यहां एक बात और बता दे ये फ़िल्म पैसे कमाने के लिए नही बनाई गई थी ये अपने मंसूबों को कामयाब बनाने के लिये थी जिसमें वे लोग सफ़ल रहे।
‘बंटवारा 1947’ की असफलता से क्या सीख मिलती है?
इस फिल्म से सबसे बड़ी सीख सनी देओल को लेना चाहिए कि उनको अपनी इमेज के बारे में सोचना चाहिए था उनकी जो बनी बनाई इमेज थी उसको धूमिल कर दिया गया है और उनको सीख लेना ज्यादा जरूरी है ताकि भविष्य में वह अब इस तरह की फिल्म ना करें।
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निष्कर्ष: क्या मुस्लिम किरदार ही बना फिल्म के फ्लॉप होने की वजह?
तो सवाल का सीधा जवाब है— इसका सीधा ज़बाब यही हैं कि सारे कारणों में सबसे बड़ा कारण यही था।
शबाना आजमी की राय है कि दर्शक सनी देओल को मुस्लिम किरदार में स्वीकार नहीं कर पाए और यह फिल्म की कमजोर बॉक्स ऑफिस परफॉर्मेंस की एक वजह हो सकती है।
दूसरी तरफ निर्देशक राजकुमार संतोषी इस सोच को स्वीकार नहीं करते।
वैसे भी हर इंसान की अपनी अपनी सोच होती हैं लेक़िन यहां इस फ़िल्म से धार्मिक भवनाओं को आहत करने की पूरी कोशिश की गई हैं।
अब सवाल यह है—
क्या भारतीय दर्शक अपने पसंदीदा स्टार को उसकी पुरानी छवि से बाहर निकलकर एक बिल्कुल अलग किरदार में स्वीकार करने के लिए तैयार हैं?
‘बंटवारा 1947’ की बॉक्स ऑफिस कहानी ने इस सवाल को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है और इसका ज़बाब हैं बिल्कुल नही।
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जय हिंद।
